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आचार्य श्रीराम शर्मा >> मरणोत्तर श्राद्ध-कर्म-विधान

मरणोत्तर श्राद्ध-कर्म-विधान

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :4
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15530
आईएसबीएन :0

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इसमें मरणोत्तर श्राद्ध-कर्म विधानों का वर्णन किया गया है..... 

10

पंच यज्ञ

॥ ब्रह्मयज्ञ ॥

ब्रह्मयज्ञ में गायत्री विनियोग होता है। मरणोत्तर संस्कार के संदर्भ में एकत्रित सभी कुटुम्बी-हितैषी परिजन एक साथ बैठे। मृतात्मा के स्नेह-उपकारों का स्मरण करें। उसकी शान्ति-सद्गति की कामना व्यक्त करते हुए सभी लोग भावनापूर्वक पाँच मिनट गायत्री मन्त्र का मानसिक जप करें, अन्त में अपने जप का पुण्य मृतात्मा के कल्याणार्थ अर्पित करने का भाव करें- यह न्यूनतम है। यदि सम्भव हो, तो शुद्धि दिवस के बाद त्रयोदशी तक भावनाशील परिजन मिल-जुलकर गायत्री जप का एक लघु अनुष्ठान पूरा कर लें। ब्रह्मयज्ञ को उसकी पूर्णाहुति मानें। संकल्प बोले

...नामाहं ..नाम्न:प्रेतत्वनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मलोकावाप्तये ...परिमाणं गायत्री महामन्त्रानुष्ठानपुण्यं श्रद्धापूर्वकम् अहं समर्पयिष्ये।

॥ देवयज्ञ ॥

देवयज्ञ में देववृत्तियों का पोषण किया जाए। दुष्प्रवृत्तियों के त्याग और सत्प्रवृत्तियों के अभ्यास का उपक्रम अपनाने से देवशक्तियाँ तृष्ट होती हैं, देववृत्तियाँ पुष्ट होती हैं। श्राद्ध के समय संस्कार करने वाले प्रमुख परिजन सहित उपस्थित सभी परिजनों को इस यज्ञ में यथाशक्ति भाग लेना चाहिए।

अपने स्वभाव के साथ जुड़ी दुष्प्रवृत्तियों को सदैव के लिए या किसी अवधि तक के लिए छोड़ने, परमार्थपरक गतिविधियों को निश्चित समय तक के लिए अपनाने का संकल्प कर लिया जाए, उसका पुण्य मृतात्मा के हितार्थ अर्पित किया जाए। संकल्प-

.......नामाहं ...नामकमृतात्मनः देवगतिप्रदानार्थं ...दिनानि यावत् - मासपर्यन्तं-वर्षपर्यन्तं .....दुष्प्रवृत्त्युन्मूलनैः ......सत्प्रवृत्तिसंधारणैः जायमानं पुण्यं मृतात्मनः समुत्कर्षणाय श्रद्धापूर्वकम् अहं समर्पयिष्ये।

॥ पितृयज्ञ - पिण्डदान ॥

यह कृत्य पितृयज्ञ के अन्तर्गत किया जाता है। जिस प्रकार तर्पण में जल के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त की जाती है, उसी प्रकार हविष्यान्न के माध्यम से अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति की जानी चाहिए। मरणोत्तर संस्कार में १२ पिण्डदान किये जाते हैं-जौ या गेहूँ के आटे में तिल, शहद, घृत, दूध मिलाकर लगभग एक-एक छटाँक आटे के पिण्ड बनाकर एक पत्तल पर रख लेने चाहिए। संकल्प के बाद एक-एक करके यह पिण्ड जिस पर रखे जा सकें, ऐसी एक पत्तल समीप ही और रख लेनी चाहिए।

छ: तर्पण जिनके लिए किये गये थे, उनमें से प्रत्येक वर्ग के लिए एक-एक पिण्ड है। सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के लिए है। अन्य पाँच पिण्ड उन मृतात्माओं के लिए हैं, जो पुत्रादि रहित हैं, अग्निदग्ध हैं, इस या किसी जन्म के बन्धु हैं, उच्छिन्न कुल, वंश वाले हैं, उन सबके निमित्त ये पाँच पिण्ड समर्पित हैं। ये बारहों पिण्ड पक्षियों के लिए अथवा गाय के लिए किसी उपयुक्त स्थान पर रख दिये जाते हैं। मछलियों को चुगाये जा सकते हैं। पिण्ड रखने के निमित्त कुश बिछाते हुए निम्न मन्त्र बोलें।

ॐ कुशोऽसि कुश पुत्रोऽसि, ब्रह्मणा निर्मितः पुरा।
त्वय्यर्चितेऽर्चितः सोऽस्तु, यस्याहं नाम कीर्तये॥

॥ पिण्ड समर्पण प्रार्थना ॥

पिण्ड तैयार करके रखें, हाथ जोड़कर पिण्ड समर्पण के भाव सहित नीचे लिखे मन्त्र बोले जाएँ-

ॐ आब्रह्मणो ये पितृवंशजाता, मातुस्तथा वंशभवा मदीयाः।
वंशद्वये ये मम दासभूता, भृत्यास्तथैवाश्रितसेवकाश्च॥
मित्राणि शिष्याः पशवश्च वृक्षाः, दृष्टाश्च स्पृष्टाश्च कृतोपकाराः
जन्मान्तरे ये मम संगताश्च, तेषां स्वधा पिण्डमहं ददामि॥

॥ पिण्डदान ॥

क्रमश: एक-एक पिण्ड दाहिने हाथ में लिया जाए। मन्त्र बोलने के साथ पितृतीर्थ मुद्रा से पिण्ड अर्पित करें। सभी पिण्ड किसी थाली या पत्तल में क्रमश: स्थापित किए जाएँ।

१. प्रथम पिण्ड देवताओं के निमित्त-

ॐ उदीरतामवर उत्परास, ऽ उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः॥ असुं यऽईयुरवृका ऋतज्ञाः, ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु। १९.४९

२. दूसरा पिण्ड ऋषियों के निमित्त-

ॐ अंगिरसो नः पितरो नवग्वा, अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः। तेषां वय सुमतौ यज्ञियानां, अपि भद्रे सौमनसे स्याम॥ -१९५०

३. तीसरा पिण्ड दिव्य मानवों के निमित्त-

ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासः, अग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तः, अधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥- १९५८।

४. चौथा पिण्ड दिव्य पितरों के निमित्त-

ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं, पयः कीलालं परिघुतम्। स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन्॥ - २३४

५. पाँचवाँ पिण्ड यम के निमित्त

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्य: स्वधा नमः, पितामहेभ्य: स्वधा- यिभ्यः स्वधा नमः, प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। अक्षत् पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त, पितरः पितरः शुन्धध्वम्।१९.३६।

६. छठवाँ पिण्ड मनुष्य - पितरों के निमित्त-

ॐ ये चेह पितरो ये च नेह, याँश्च विद्म याँ २ उ च न प्रविद्म। त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः, स्वधाभिर्यज्ञ सुकृतं जुषस्व॥ १९६७

७. सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के निमित्त 

ॐ नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितर: शोषाय, नमो वः पितरो जीवाय, नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो घोराय, नमो वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः पितरो, नमो वो गृहान्नः पितरो, दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः, पितरो वासऽआधत्त। -२.३२

८. आठवाँ पिण्ड पुत्रदार रहितों के निमित्त -

ॐ पितृवंशे मृता ये च, मातृवंशे तथैव च।
गुरुश्वसुरबन्धूनां, ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः॥
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥

९. नौवाँ पिण्ड उच्छिन्न कुलवंश वालों के निमित्त -

ॐ उच्छिन्नकुलवंशानां, येषां दाता कुले नहि।
धर्मपिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥।

१०. दसवाँ पिण्ड गर्भपात से मर जाने वालों के निमित्त -

ॐ विरूपा आमगर्भाश्च, ज्ञाताज्ञाता: कुले मम॥
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥

११. ग्यारहवाँ पिण्ड अग्निदग्धों आदि के निमित्त -

ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा, ये प्रदग्धाः कुले मम।
भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु, धर्मपिण्डे ददाम्यहम्।।

१२. बारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बंधुओं के निमित्त -

ॐ ये बान्धवा 5 बान्धवा वा, ये ऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठत्॥

यदि तीर्थ श्राद्ध में, पितृपक्ष में से एक से अधिक पितरों की शान्ति के लिए पिण्ड अर्पित करने हों, तो नीचे लिखे वाक्य में पितरों के नाम-गोत्र आदि जोड़ते हुए वांछित संख्या में पिण्डदान किये जा सकते हैं।

ॐ अद्य .........गोत्रस्य अस्मद्.......... नाम्नो, अक्षयतृप्त्यर्थ इदं पिण्डं तस्मै स्वधा॥

पिण्ड समर्पण के बाद पिण्डों पर क्रमश: दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्रार्थना की जाती है।

(१) निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पिण्ड पर दूध चढ़ाएँ।

ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥-१८.३६

पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ-

ॐ दुग्धम्। दुग्धम्। दुग्धम्। तृष्यध्वम्। तृष्यध्वम्। तृप्यध्वम्।

(२) निम्नांकित मन्त्र से पिण्ड पर दही चढ़ाएँ-

ॐ दधिक्राव्णो ऽ अकारिषं, जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभि नो मुखाकरप्रण, आयू छ षि तारिषत्॥ - २३.३२

पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश दुहराएँ-

ॐ दधि। दधि। दधि। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्॥

(३) नीचे लिखे मन्त्रों के साथ पिण्डों पर शहद चढ़ाएँ।

ॐ मधुवाता ऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्न: सन्त्वोषधीः।
ॐ मधु नक्तमुतोषसो, मधुमत्पार्थिव ४ रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।
ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ१ऽअस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः।

- १३.२७-२९

पिण्डदानकर्ता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ।

ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृष्यध्वम्। तृष्यध्वम्॥

॥ भूतयज्ञ - पंचबलि ॥

भूतयज्ञ के निमित्त पंचबलि प्रक्रिया की जाती है। विभिन्न योनियों में संव्याप्त जीव चेतना की तुष्टि हेतु भूतयज्ञ किया जाता है। अलग-अलग पत्तों या एक ही बड़ी पत्तल पर, पाँच स्थानों पर भोज्य पदार्थ रखे जाते हैं। उर्द-दाल की टिकिया तथा दही इसके लिए रखा जाता है। पाँचों भाग रखें। क्रमश: मन्त्र बोलते हुए एक-एक भाग पर अक्षत छोड़कर बलि समर्पित करें।

(१) गोबलि - पवित्रता की प्रतीक गऊ के निमित्त-

ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः, पवित्रा: पुण्यराशयः।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं, गावस्त्रैलोक्यमातरः॥
इदं गोभ्यः इदं न मम।

(२) कुक्कुरबलि - कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक श्वान के निमित्त-

ॐ द्वौ श्वानौ श्यामशब्बलौ, वैवस्वतकुलोद्भवौ।
ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि, स्यातामेतावहिंसको॥
इदं श्वभ्यां इदं न मम॥

(३) काकबलि - मलीनता निवारक काक के निमित्त-

ॐ ऐन्द्रावारुणवायव्या, याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसा: प्रतिगृह्णन्तु , भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्॥
इदं वायसेभ्यः इदं न मम॥

(४) देवादिबलि- देवत्व संवर्धक शक्तियों के निमित्त-

ॐ देवा: मनुष्याः पशवो वयांसि, सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेता: पिशाचास्तरव: समस्ता, ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्॥ इदं अन्नं देवादिभ्यः इदं न मम।

(५) पिपीलिकादिबलि - श्रमनिष्ठा की प्रतीक चीटियों के निमित्त-

ॐ पिपीलिकाः कीटपतंगकाद्याः, बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः।
तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं, तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥
इदं अन्नं पिपीलिकादिभ्यः इदं न मम।

बाद में गोबलि गऊ को, कुक्कुरबलि श्वान को, काकबलि पक्षियों को, देवबलि कन्या को तथा पिपीलिकादिबलि चींटी आदि को खिला दिया जाए।

॥ मनुष्य यज्ञ-श्राद्ध संकल्प ॥

इसके अन्तर्गत दान का विधान है। दिवंगत आत्मा ने उत्तराधिकार में जो छोड़ा है, उसमें से उतना अंश ही स्वीकार करना चाहिए, जो पीछे वाले बिना कमाऊ बालकों या स्त्रियों के निर्वाह के लिए अनिवार्य हो-कमाऊ सन्तान को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। असमर्थ स्थिति में अभिभावकों की सेवा स्वीकार करना उचित था, पर जब वयस्क और कमाऊ हो गये, तो फिर उसे लेकर “हराम-खाऊ” मुफ्तखोरों में अपनी गणना क्यों कराई जाए?

पूर्वजों के छोड़े हुए धन में कुछ अपनी ओर से श्रद्धांजलि मिलाकर उनकी आत्मा के कल्याण के लिए दान कर देना चाहिए-यही सच्चा श्राद्ध है। तर्पण और पिण्डदान पर्याप्त नहीं, वह क्रिया कृत्य तो मात्र प्रतीक हैं। श्रद्धा की वास्तविक परीक्षा उस श्राद्ध में है कि पूर्वजों की कमाई को उन्हीं की सद्गति के लिए, सत्कर्मों के लिए दान रूप में समाज को वापस कर दिया जाए। अपनी कमाई का जो सदुपयोग, मोह या लोभवश स्वर्गीय आत्मा नही कर सकी थी, उस कमी की पूर्ति उसके उत्तराधिकारियों को कर देनी चाहिए।

प्राचीनकाल में ब्राह्मण का व्यक्तित्व एक समग्र संस्था का प्रतिरूप था। उन्हें जो दिया जाता था, उसमें से न्यूनतम निर्वाह लेकर शेष को समाज की सत्प्रवृत्तियों में खर्च करते थे। अपना निर्वाह भी इसीलिए लेते थे कि उन्हें निरन्तर परमार्थ प्रयोजनों में ही लगा रहना पड़ता था। आज वैसे ब्राह्मण नहीं हैं। दोस्तों-रिश्तेदारों को मृत्यु के उपलक्ष्य में दावत खिलाना मूर्खता और उनका खाना निर्लज्जता है, इसलिए मृतकभोज की विडम्बना में न हँसकर श्राद्धधन परमार्थ प्रयोजन के लिए लगा देना चाहिए, जिससे जनमानस में सद्ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो और वे कल्याणकारी सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करें-यही सच्चा श्राद्ध है।

लोक हितकारी परमार्थिक कार्यों के लिए दिये जाने वाले दान की। घोषणा श्राद्ध संकल्प के साथ की जानी चाहिए।

॥ संकल्प ॥

नामाहं ....नामकमृतात्मनः शान्ति-सद्गति-निमित्तं लोकोपयोगिकार्यार्थ ....... परिमाणे धनदानस्य कन्याभोजनस्य वा श्रद्धापूर्वक संकल्पम् अहं करिष्ये॥

संकल्प के बाद निम्न मन्त्र बोलते हुए अक्षत-पुष्प देव वेदी पर चढ़ाएँ।

ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशतऽ आ वह पितृन्हविषेऽअत्तवे॥ ॐ दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वाऽवतु बृहत्। साम, पंचदशस्तोमो ग्रीष्मऽऋतुः क्षत्रं द्रविणम् ॥ -१९७० १०.११

इसके बाद अग्नि स्थापना करके गायत्री यज्ञ सम्पन्न करें।

॥ अग्निस्थापन ॥

तत्पश्चात् किसी पात्र या चमचे में अग्नि रखकर या कपूर जलाकर नीचे लिखे मन्त्र का उच्चारण करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ हवन कुण्ड में अग्नि स्थापित करें-

ॐ भूर्भुवः स्वरिव भूम्ना, पृथिवीव वरिष्णा। तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि, पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादथे। अग्निं दूतं पुरोदधे, हव्यवाहमुपब्रुवे। देवाँऽआसादयादिह। - ३५, २२.१७

ॐ अग्नये नमः।आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। गन्धाक्षतं पुष्पाणि समर्पयामि।

॥ अग्नि प्रदीपन ॥

तत्पश्चात अग्नि पर छोटे काष्ठ और कपूर रखकर निम्न मन्त्र द्वारा पंखे से अग्नि को प्रदीप्त करें-

ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि, त्वमिष्टा पूर्ते स छ सृजेथामयं च। अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्, विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत।- १५.५४,१८६१

॥ समिधाधान ॥

तत्पश्चात् निम्न चार मन्त्रों से आठ-आठ अंगुल की आम्र-पलासादि की चार समिधाएँ प्रत्येक मन्त्र के उच्चारण के बाद क्रमशः घी आम्र डुबोकर अग्नि में अर्पित करें।

१-ॐ अयन्त इध्म आत्मा, जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व।
चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया, पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन, अन्नाद्येन समेधय स्वाहा। 

इदं अग्नये जातवेदसे इदं न मम॥
-आश्व० गृ० सू० ११०

२-ॐ समिधाऽग्निं दुवस्यत, घृतैर्बोधयतातिथिम्।
आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम॥

३-ॐ सुसमिद्धाय शोचिषे, घृतं तीव्र जुहोतन।
अग्नये जातवेदसे स्वाहा।
इदं अग्नये जातवेदसे इदं न मम॥

४- ॐ तं त्वा समिभिरङ्गिरो, घृतेन वर्धयामसि।
बृहच्छोचा यविष्ठ्य स्वाहा।
इदं अग्नये अंगिरसे इदं न मम॥ - ३.१-३

॥ जलप्रसेचन ॥

प्रोक्षणी पात्र में जल भरकर निर्दिष्ट दिशाओं में कुंड के चारों ओर छोड़े-

ॐ अदितेऽनुमन्यस्व॥ (इति पूर्वे)
ॐ अनुमतेऽनुमन्यस्व॥ (इति पश्चिमे)
ॐ सरस्वत्यनुमन्यस्व॥ (इति उत्तरे) -गो० गृ० सू० १.३.१-३
ॐ देव सवितः प्रसुव यज्ञं, प्रसुव यज्ञपति भगाय।
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः , केतं नः पुनातु , वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु॥
(इति चतुर्दिक्षु) -११७

॥ आज्याहुति ॥

सात देवशक्तियों को सात आहुतियाँ घृत की खुवा पात्र से समर्पित करें। सूवा से बचा हुआ घृत इदं न मम के साथ प्रणीता पात्र के भरे जल में हर आहुति के बाद अर्पित करते चलें--

१- ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये इदं न मम॥-१८.२८

२- ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय इदं न मम॥

३- ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम॥

४- ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय इदं न मम॥-२२.२७

५- ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम॥

६- ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे इदं न मम॥

७- ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय इदं न मम॥-गो गृ० सू० १८.१५

॥ गायत्रीमन्त्राहुति ॥

इसके पश्चात् गायत्री मन्त्र से बारह या चौबीस आहुतियाँ समर्पित करें

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं गायत्र्यै इदं न मम॥ - ३६.३

॥ विशेष आहुति ॥

फिर नीचे लिखे मन्त्र से ३ विशेष आहुतियाँ दें--

ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे, महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात् स्वाहा। इदं यमाय इदं न मम॥ - यः गा०

॥ स्विष्टकृतुहोम ॥

यह आहुति त्रुटि या अशुद्धि की पूर्ति के प्रायश्चित्त के रूप में समर्पित की जाती है। स्रुचि पात्र में मिष्टान्न रखकर अग्नि में समर्पित करें-

ॐ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं, यद्वान्यूनमिहाकरम्।
अग्निष्टत् स्विष्टकृद् विद्यात्सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे।
अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते, सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां,
समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समद्धेय स्वाहा।
इदम् अग्नये स्विष्टकृते इदं न मम॥
-आश्व गृ० सू० १.१०

॥ पूर्णाहुति ॥

सुचि पात्र में सुपाड़ी या नारियल घृत सहित रखकर पूर्णाहुति समर्पित करें-

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं , पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ पूर्णादवि परापत, सुपूर्णा पुनरापत॥
वस्नेव विक्रीणा वहा, इषमूर्ज शतक्रतो स्वाहा।
ॐ सर्वं वै पूर्ण स्वाहा। - बृह० उ० ५.१.१; यजु० ३.४९

॥ वसोर्धारा॥

अब घृत का पात्र लेकर सुचि पात्र के सहारे घृत की धारा छोड़ते हुए पूरा बचा घृत मन्त्र के साथ समर्पित करते चलें-

ॐ वसोः पवित्रमसि शतधारं, वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्।
देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः, पवित्रेण शतधारेण सुप्वा,
कामधुक्षः स्वाहा॥ - १.३

॥ आरती ॥

थाली में दीप जलाकर निम्न मन्त्र के साथ आरती सम्पन्न करें-

ॐ यं ब्रह्मवेदान्तविदो वदन्ति, परं प्रधानं पुरुषं तथान्ये।
विश्वोद्गते: कारणमीश्वरं वा, तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय॥
ॐ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः, स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः,
वेदैः सांगपदक्रमोपनिषदैः, गायन्ति यं सामगाः॥
ध्यानावस्थित-तद्गतेन मनसा, पश्यन्ति यं योगिनो,
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणाः , देवाय तस्मै नमः॥

॥ घृत -अवघ्राण ॥

प्रणीता पात्र के घृत को हथेलियों में लगाकर अग्नि पर सेंकें और मन्त्र के बाद गायत्री मन्त्र के साथ उसे सँधे तथा मुख, नेत्र, कर्ण आदि पर लगाएँ-

ॐ तनूपा अग्नेऽसि, तन्वं मे पाहि।
ॐ आयुर्दा अग्नेऽसि, आयुर्मे देहि॥
ॐ वर्षोदा अग्नेऽसि, वर्षों में देहि।
ॐ अग्ने यन्मे तन्वा, ऽऊनन्तन्मऽआपृण॥
ॐ मेधां मे देवः, सविता आदधातु।
ॐ मेधां मे देवी, सरस्वती आदधातु॥
ॐ मेधां मे अश्विनौ, देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ।
- पाठ गृ० सू० २.४७-८

॥ भस्मधारण ॥

स्फ्य पात्र पर भस्म लपेटकर अनामिका अँगुली से निम्न मन्त्र के साथ मस्तक, कण्ठ, दक्षिण बाहु मूल तथा हृदय पर लगाएँ-

ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः, इति ललाटे।
ॐ कश्यपस्य व्यायुषम्, इति ग्रीवायाम्।
ॐ यद्देवेषु व्यायुषम्, इति दक्षिणबाहुमूले।
ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्, इति हदि।

॥ क्षमा प्रार्थना॥

मृतात्मा के प्रति जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के प्रति क्षमा याचना, विनम्रता प्रदर्शित करते हुए, गद्गद अन्त:करण से उन्हें शान्ति-तुष्टि प्राप्त होने की परमात्मा से हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-

ॐ अद्य मे सफलं जन्मभवत्पादाभिवन्दनात्।
अद्य मे गोत्रजाः सर्वे गतावोऽनुग्रहाद्दिवम्॥
पत्र शाकादिदानेन क्लेशिता यूयमीदृशाः।
तत्क्लेशजातं चित्तात्तु विस्मृत्यक्षन्तुमर्हथ॥
मन्त्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वराः।
श्राद्धं सम्पूर्णतां यातु प्रसादाद्भवतां मम॥

॥ साष्टांगनमस्कार ॥

सर्वव्यापी विराट् ब्रह्म को विश्व ब्रह्माण्ड को भगवान् का दृश्य रूप मानकर साष्टांग नमस्कार करें-

ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये, सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुष शाश्वते, सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः॥

॥ शान्ति-अभिषिंचन ।

मन्त्र पूत कलश के जल को समस्त परिजनों, घर के सभी स्थानों, उपकरणों पर छिड़कते हुए पवित्रता-शुचिता के समावेश की भावना करें-

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ॐ शान्तिः, पृथिवी शान्तिरापः, शान्तिरोषधय:शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि॥।

ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः

॥ सर्वारिष्टसुशान्तिर्भवत् ॥

विसर्जन के पूर्व पितरों तथा देवशक्तियों के लिए भोज्य पदार्थ थाली में सजाकर नैवेद्य अर्पित करें, फिर क्रमशः पिण्ड विसर्जन , पितृ विसर्जन तथा देव विसर्जन करें।

॥ विसर्जन ॥

पिण्ड विसर्जन-

नीचे लिखे मन्त्र के साथ पिण्डों पर जल सिंचित करें।

ॐ देवा गातुविदोगातुं वित्त्वा गातुमित।
मनसस्पत ऽ इमं देवयज्ञ ४ स्वाहा वाते धाः॥ - ८.२१

पितृ विसर्जन-

पितरों का विसर्जन तिलाक्षत छोड़ते हुए करें।

ॐ यान्तु पितृगणाः सर्वे, यतः स्थानादुपागताः।
सर्वे ते हृष्टमनसः, सर्वान् कामान् ददन्तु मे॥
ये लोका: दानशीलानां, ये लोकाः पुण्यकर्मणाम्।
सम्पूर्णान् सर्वभोगैस्तु , तान् व्रजध्वं सुपुष्कलान्॥
इहास्माकं शिवं शान्तिः, आयुरारोग्यसम्पदः।
वृद्धिः सन्तानवर्गस्य, जायतामुत्तरोत्तरा॥

देव विसर्जन - 

अन्त में पुष्पाक्षत छोड़ते हुए देव विसर्जन करें।

ॐ यान्तु देवगणाः सर्वे, पूजामादाय मामकीम्।
इष्ट कामसमृद्ध्यर्थं, पुनरागमनाय च॥

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    अनुक्रम

  1. ॥ मरणोत्तर-श्राद्ध संस्कार ॥
  2. क्रम व्यवस्था
  3. पितृ - आवाहन-पूजन
  4. देव तर्पण
  5. ऋषि तर्पण
  6. दिव्य-मनुष्य तर्पण
  7. दिव्य-पितृ-तर्पण
  8. यम तर्पण
  9. मनुष्य-पितृ तर्पण
  10. पंच यज्ञ

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